Wednesday, November 26, 2008

मैं तुम्हें क्या कहूँ


मैं तुम्हें क्या कहूँ

अगर कहूँ तुम्हें
कोमल कलिका,
तो मन घबरा जाता है
फूल का तो कुछ ही दिन में
अंत समय आ जाता है

अगर कहूँ तुम्हें
श्वेत सरिता
तो बेचैन मन हो जाता है
सरिता का जीवन तो
अनथक चलता जाता है

अगर कहूँ तुम्हें
नभ की तारिका
तो भयभीत मन हो जाता है
तारिका को तो इन्सान
रात में ही देख पाता है

अगर कहूँ
तुम हो साँसें मेरी
तो मन थोडा बहल जाता है
क्यूंकि यह तो तय है
श् वास तो प्राणों के साथ ही जाता है
सुजाता दुआ

Tuesday, November 25, 2008

अज्ञेय जी की कविताएँ

साँप

साँप !
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया
एक बात पूछूँ -( उत्तर दोगे ?)
तब कैसे सीखा डँसना-
विष कहाँ पाया ?
अज्ञेय
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जो पुल बनाएँगें

जो पुल बनाएँगें
वे अनिवार्यत :
पीछे रह जाएँगे
सेनाएँ हो जाएँगी पार
मारे जाएँगे रावण
जयी होंगें राम ,
जो निर्माता रहे
इतिहास में
बंदर कहलाएँगे
अज्ञेय
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Saturday, November 22, 2008

आस्था में बल है

आस्था में बल है

उसनें किया था जब प्रहार धोखे से पीठ पर
रक्त रंजित हो बिखर गया था मन वहीँ पर

अंतस में जगी गहन कसक तिलमिला कर
करुण आह निर्वासित हुई थी विपन्न मन से

आनें लगी फिर स्व आस्था पर शर्म
किया कल्पित जिसनें पाषाण में सुधा का भ्रम

झन्ना कर कुछ टुकड़े टूट कर गिरे जहाँ पर
क्षोभ के मलिन गर्भ ने जन्मीं वितृष्णा वहाँ पर

हुआ था आक्रोश इतना रूह कांपनें लगी
दवेष की ज्वाला सर्प सी नाचनें लगी

क्षण उसी प्रतिबिम्ब देख दर्पण में काँप गयी
आशा दीप्त मुख पर हताशा किस वश जनीं

फिर चेताया आत्मा ने धीरे से सहला कर
मरहम अचेतन ने लगाया थोडा बहला कर

आस्था -स्त्रोत जो हुआ था शुष्क और रसहीन
एक नव - अंकुर फूटा था वहीं पर महीन

तिमिर हुआ नहीं कभी अमर प्रकृति का नियम है
हर निशा के अंत में प्रभात का जनम है

सुजाता दुआ

Thursday, November 20, 2008

सफ़र


हो सके तो कांटे भी समेट ले आँचल में
फूल बहुत दिन तक कहाँ साथ निभाता है

क्यों हर शै पर निसार हुआ जाता है दिल
मुसाफिर को रास्तों से प्यार हुआ जाता है

साथ पल दो पल का ही हुआ है हर सफ़र
वो कौन है जो मरने के बाद साथ जाता है

फिर भी कह रहा है दिल बेसबब बार बार
वीरानी ऐ सफ़र न मिले किसी को हर बार

सुजाता दुआ

Wednesday, November 19, 2008

अंजामे बेवफाई

दास्ताने दिल वो सुनाता है आज
रो कर जखम सहलाता है आज
एक वकत था की दिल तोड़ने में
पल भर भी नहीं लगाता था जो
इल्जामे बेवफाई लगाता है आज

जैसे भूखा... रोटी छीन लेता है
वेह हमदम की हंसी छीन लेता था
कहता था खुद को खुदाए मुहब्बत
जमीन ऐ मुहब्बत ही चीर देता था

कौन जाने क्या चाहता था वो
जखम बना कर सहलाता था वो
खूने दिल से सींच कर जमीन
बेरुखी से कांटे उगाता था वो

सुजाता दुआ

Tuesday, November 18, 2008


अंतिम ख्वाहिश

आज जी चाहता है कहती रहूँ
प्रेम के दरिया मैं बहती रहूँ
खुदा न करे डूब जाऊं अगर
तुम से न मिल पाऊँ अगर
प्रिय इतना तो कर देना
दिल के पिछले कमरे मैं
थोडी सी जगह देना
चुपचाप पड़ी रहूँ गी.....
जरा दरवाजेदिल खुला रखना
की नगमों की आहट सुनती रहूँ
कुछ खवाब मैं भी बुनती रहूँ
सुजाता दुआ

हमदम

हर लम्हा दे जाता है खुशबू उसकी
हर आंसू गम दे जाता है
मेरा हमदम ऐसा है यारों
हंसते हंसते आंसू दे जाता है
सुजाता दुआ

उदासी

कब छोडोगे उदासी का आँचल
की हम तो अब हार गए
चले थे कुछ दिए जलाने
की खुद ही शमा हार गए
सुजाता दुआ


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खामोशी

खामोशी कुछ नहीं कहती बस तोड़ देती है
लहरों को उठने से पहले ही मोड़ देती है
कोई क्या जाने लहरों का गम ........
जब दरिया ही साथ छोड़ देती है ....!!

सुजाता दुआ



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Monday, November 10, 2008

क्यों है अब भी आस .........


तुमने चाहा था
खोल दूँ दिल की गांठ
होंठ तो खुले पर
शब्द निकले ही नहीं

आँखों ने तो कही थी
मन की वेह बात पर
तुम समझे ही नहीं

मैंने चाहा तो था तुम
पढो दिल की किताब
उन पृष्ठों पर थे जो शब्द
तुम्हे दिखे ही नहीं

कहा था तुमने
यह है जनम भर का साथ
पर कहां था तुम्हारा हाथ
मुझे दिखा ही नहीं

मेरा हर सवाल
लोट आता खाली हाथ
फिर भी हो भ्रमित
चल रहीं हूँ साथ
क्यों है अब भी आस
मैं समझी ही नहीं

सुजाता दुआ

Saturday, November 8, 2008

उसने मांगी रुखसत .....

उसने मांगी रुखसत तो आँखे भीग आई मेरी
बेनाम रिश्ते मैं जज्बात क्यों इस कदर हावी हैं

आह भरता था वो जब भी दर्द उठता था मेरे सीने मैं
था जो जान से प्यारा क्यों दुश्मन आज वो हो गया

वक्त किसी के लिये न रुका है न रुकेगा 'सुजाता'
फिर कौन देखे उसे जो राह मैं घायल हो गया

सुजाता

जिन्दगी ख्वाब होती .......

जिन्दगी ख्वाब होती तो अच्छा होता
आँख खुलने पर हर गम धुंआ होता

ख्वाहिशों को जी लेते जी भर नींद में
अरमानो का खून न देखना होता

भटक जाते गर राहे सफ़र मैं तो .......
झट खोल देते आँखे खोने का डर न होता

सुजाता दुआ

वल्लाह ! आज वहां क्यों खामोशी है

वल्लाह ! आज वहां क्यों खामोशी है
शायद कोई आंसू बहा रहा होगा

जनाजा मेरे चैन का निकला है
और गम वो वहां मना रहा होगा

कितना मासूम है हमदम मेरा
बेवजह मातम मना रहा होगा।
सुजाता

तजुर्बा

जिन्दगी का तजुर्बा  है कोई कहावत नहीं
वैसे तो किसी से  कोई शिकायत नहीं
पर दर्द बहुत देता है कोई  जखम .........
जब वक्त   बेदर्दी से मिटटी हटा देता है
सुजाता दुआ
संग दिल हो हमसफ़र तो क्या करे गोया कोई
अंधेरों में बेआवाज .......आँचल भिगोये कोई

हंगामे फुरकत में... हमसफ़र हैं यादों के दिए
जिनमें शबे दार बन... आह भर रोया कोई

अपनों ने ही किये हैं जुल्मों सितम बारहा
गैरों की बेवफाई पर क्यों कर रोया कोई

सादिक के इंतजार में जिस्त लगी हैं मिटने
किस तरह बुझने से ...अब ...इसे बचाए कोई

सुजाता
वो पहला अहसास ....

उस दिन जब पहली
बार तुम्हे देखा था
पता नहीं वह क्या था ??
जो मैंने महसूस किया था

अचानक धडकने बढ़ गयी थी
एकपल को तो लगा
भी उखड गयी थी

भूल गया मैं की
वहां क्यों आया था
तुम्हारे रूप ने ऐसा
मुझे भरमाया था

पर तुमने एक बार भी
पलके नहीं उठाई
मुझ अकिंचन नै
नै किस्मत
कहाँ थी ऐसी पाई

मैं बुत समान खडा था
दीवाना था की
शायद मनचला हो चला था ..

कुछ क्षण मैं
न जाने क्या क्या
बीत गया
मेरा मन तब
तुम्हारे जाने
के साथ ही रीत गया ...!!!!!
सुजाता दुआ

एक मासूम सा ख्वाब

कल फिर उससे मुलाकात हुई
न जाने क्यों वो उदास थी,
कुछ न कुछ तो ज़रूर बात थी।

पर वो न मेरी दोस्त थी
न ही मैं उसे जानता था
पर फिर भी लगता था
बरसों से पहचानता था।

उसके गीले गाल
कुछ कह रहे थे,
जी चाह रहा था कि
उसके सारे आंसू पी लूं,
कितने ही जख्म हों, सब मैं ले लूं।

पर मर्यादा में बंधा
वहीं रह गया,
चुपचाप
यूं ही खड़ा रह गया......

कुछ देर बाद
वह उठ कर चल दी....
सोचा आज यूं ही नहीं जाने दूंगा
कुछ भी हो जाए
फिर इसे नहीं खोने दूंगा।

मैने पुकारा ...रूको... तो ज़रा...
ठहरो ज़रा, मत जाओ.....
पर वह....... न मुड़ी....!!! न रुकी.....!!!
गर होती तो..... रुकती शायद?

यह तो मेरा मन था
जो सपने बुन रहा था,
खयालों मैं उसका
साया चुन रहा

घबरा कर उठा तो
चारों तरफ अंधेरा था,
बेवफा अंधेरे में ,
मेरा साया ही कहां मेरा था....
सुजाता दुआ, दिल्ली