Saturday, November 8, 2008

उसने मांगी रुखसत .....

उसने मांगी रुखसत तो आँखे भीग आई मेरी
बेनाम रिश्ते मैं जज्बात क्यों इस कदर हावी हैं

आह भरता था वो जब भी दर्द उठता था मेरे सीने मैं
था जो जान से प्यारा क्यों दुश्मन आज वो हो गया

वक्त किसी के लिये न रुका है न रुकेगा 'सुजाता'
फिर कौन देखे उसे जो राह मैं घायल हो गया

सुजाता

जिन्दगी ख्वाब होती .......

जिन्दगी ख्वाब होती तो अच्छा होता
आँख खुलने पर हर गम धुंआ होता

ख्वाहिशों को जी लेते जी भर नींद में
अरमानो का खून न देखना होता

भटक जाते गर राहे सफ़र मैं तो .......
झट खोल देते आँखे खोने का डर न होता

सुजाता दुआ

वल्लाह ! आज वहां क्यों खामोशी है

वल्लाह ! आज वहां क्यों खामोशी है
शायद कोई आंसू बहा रहा होगा

जनाजा मेरे चैन का निकला है
और गम वो वहां मना रहा होगा

कितना मासूम है हमदम मेरा
बेवजह मातम मना रहा होगा।
सुजाता

तजुर्बा

जिन्दगी का तजुर्बा  है कोई कहावत नहीं
वैसे तो किसी से  कोई शिकायत नहीं
पर दर्द बहुत देता है कोई  जखम .........
जब वक्त   बेदर्दी से मिटटी हटा देता है
सुजाता दुआ
संग दिल हो हमसफ़र तो क्या करे गोया कोई
अंधेरों में बेआवाज .......आँचल भिगोये कोई

हंगामे फुरकत में... हमसफ़र हैं यादों के दिए
जिनमें शबे दार बन... आह भर रोया कोई

अपनों ने ही किये हैं जुल्मों सितम बारहा
गैरों की बेवफाई पर क्यों कर रोया कोई

सादिक के इंतजार में जिस्त लगी हैं मिटने
किस तरह बुझने से ...अब ...इसे बचाए कोई

सुजाता
वो पहला अहसास ....

उस दिन जब पहली
बार तुम्हे देखा था
पता नहीं वह क्या था ??
जो मैंने महसूस किया था

अचानक धडकने बढ़ गयी थी
एकपल को तो लगा
भी उखड गयी थी

भूल गया मैं की
वहां क्यों आया था
तुम्हारे रूप ने ऐसा
मुझे भरमाया था

पर तुमने एक बार भी
पलके नहीं उठाई
मुझ अकिंचन नै
नै किस्मत
कहाँ थी ऐसी पाई

मैं बुत समान खडा था
दीवाना था की
शायद मनचला हो चला था ..

कुछ क्षण मैं
न जाने क्या क्या
बीत गया
मेरा मन तब
तुम्हारे जाने
के साथ ही रीत गया ...!!!!!
सुजाता दुआ

एक मासूम सा ख्वाब

कल फिर उससे मुलाकात हुई
न जाने क्यों वो उदास थी,
कुछ न कुछ तो ज़रूर बात थी।

पर वो न मेरी दोस्त थी
न ही मैं उसे जानता था
पर फिर भी लगता था
बरसों से पहचानता था।

उसके गीले गाल
कुछ कह रहे थे,
जी चाह रहा था कि
उसके सारे आंसू पी लूं,
कितने ही जख्म हों, सब मैं ले लूं।

पर मर्यादा में बंधा
वहीं रह गया,
चुपचाप
यूं ही खड़ा रह गया......

कुछ देर बाद
वह उठ कर चल दी....
सोचा आज यूं ही नहीं जाने दूंगा
कुछ भी हो जाए
फिर इसे नहीं खोने दूंगा।

मैने पुकारा ...रूको... तो ज़रा...
ठहरो ज़रा, मत जाओ.....
पर वह....... न मुड़ी....!!! न रुकी.....!!!
गर होती तो..... रुकती शायद?

यह तो मेरा मन था
जो सपने बुन रहा था,
खयालों मैं उसका
साया चुन रहा

घबरा कर उठा तो
चारों तरफ अंधेरा था,
बेवफा अंधेरे में ,
मेरा साया ही कहां मेरा था....
सुजाता दुआ, दिल्ली