Thursday, July 18, 2013

जिन्दगी


बार बार मर के जीना सिखा दिया
रोते रोते  हंसना सिखा दिया तूने

फूलों पर चल कर इतराते हैं  लोग
काँटों पर चल कर इतराना सिखा दिया तूने

सुनते थे की चिरागों से रोशन होती हैं राहे
दमकते आंसुओं की  ओस से राहो को सजा दिया तूने

पथरीली राहों पर होते हैं घायल  लोगों के कदम
घायल कदमों से मंजिलों को चूमना सिखा दिया तूने

लोग कहते हैं तुझे बेरहम लेकिन
मुझे बिन पंखों के उड़ना सिखा दिया तूने 
औरत
एक ह्रदय अनेक आधार
एक जीवन हज़ार उपकार

लगातार बार बार
चाहे मिले
आलोचना तिरिस्कार

फिर भी
कोमल हृदया
उड़ेलती रही
प्यार प्यार प्यार

Friday, July 12, 2013

ऐ जिन्दगी तेरे अहसान उतारने है मुझे
वक्त रहते कुछ कर्ज उतारने हैं मुझे

वो आंसू जो तूने   दिए थे कभी
बन के मोती  पन्नो पर दमकते हैं अब भी

वो श हतूत के पेड़ से गिरना और
आधी बेहोशी में घर तक जाना
जीवन  के मुश्किल पलों   में लडखडा कर चलना सिखा गया  था

वो रूमानी  अहसास जो किसी कोमल पल में
तूने यूँ ही मेरी झोली में डाल दिए थे
वो आज भी महकते हैं उसी तरह

मेरे बेटे  का वो नन्हा स्पर्श जो
मैंने पहली बार अपने गर्भ में अनुभव किया था
वो आज भी ज्यूँ का त्यूं मेरी आत्मा में ज़िंदा है

वो  सेंकडों लम्हे जब दोस्तों के साथ
घंटों और दिनों तक एक ही बात पर हंसा करती थी मैं
आज भी मुझे गुदगुदा कर जाते हैं कभी कभी

वो मुश्किल पल जिन्होंने पल पल रुलाया
न जाने कब मन की गहराइयों तक पेठ कर
कतरा कतरा मेरे कोमल मन को सींचते रहे
की   आज कठिन से कठिन पल भी आसान लगने लगा   है


डगमगाना ,गिरना ,सम्हलना,फिर चलना और मुस्कराना
कितना कुछ तूने यूँ ही सिखाया है मुझे  

ऐ जिन्दगी तेरे अहसान उतारने है मुझे
वक्त रहते कुछ कर्ज उतारने हैं मुझे

     

Friday, January 11, 2013



खामोशी को मिलती हो  जहां  जुबान 
मुझे वो जहाँ  दे दो 

बहुत वक्त   से पहने हैं   होंठों ने पेबंद 
  इन्हें एक नया पेरहन दे दो 

हसरते कितनी खामोश सिसकती हैं यहाँ 
मिले जाए   पनाह वो जहाँ दे दो 

या मेरे हिस्से के आसमान को 
कैद से रिहा दे  दो 

Tuesday, December 18, 2012

सड़क के उस पार अन्धेरा है और  इ धर रोशनी चकाचक 
रोशनी में रहने वाले अन्धेरे से दूर हैं बहुत दूर 
 दोनों तरफ के लोग भी 
अलग हैं 
पर  एक बात दोनों में  एक सी है 
रोशनी में रहने वाले सोचते हैं 
थोड़ा अन्धेरा हो जाए 
और अँधेरे में    रहने वाले 
बड़ी शिद्दत से थोड़ी रोशनी चाहते हैं 

 
  

Saturday, October 27, 2012

(नज्म )


मुजमिन्द रहा फिर भी ......


जल गया ख्वाबे जहाँ


रात कुटना हो गयी


बेच कर सारे जज्बात


हर उम्मीद सो गयी




उठ रहा था उस तरफ़


सुर्ख लाल सा धुआं


हो रहा था हर तरफ़


ख्वाबे -कत्ले -आमद वहाँ




थी  हवा बेहद गरम


शयातीन सारी फिजा


जैसे साजिश कर रहा


जर्रा -जर्रा बारहा




स्याह परदों ने छुपाई


उममीद की हर किरण


लिए करवट बैठे रहे


सितारे तमाम बेरहम




कुल्ब हो चला था


ाहे मेरा जहाँ .............

ुजमिंद रहा था फिर भी

खुदा तुझ पे मेरा यकीं ....!!!!!

sujata











Sunday, October 14, 2012

ख़याल जब बचपन में हुआ करता था

दूध सा शफ्फाक   हुआ करता था
ख़याल जब बचपन में हुआ करता था

झांसी की रानी और राणा प्रताप का घोड़ा
कल्पना में  अक्सर रूबरू हुआ करता था

खून  भी रगों का बहुत उबाल  खाता था
ख्वाब में  भी गर दुश्मन आँख उठाता था

आज जब वक्त है और जवानी  भी
खून भी है  गरम है  रगों में रवानी भी

 झांसी की  रानी  को भूल कर
चेतक की  स्वामी भक्ति रख ताक पर

मैं मशगूल हूँ   हर दिन के काम
  और  ऐशो -आराम में 

भूल कर खुद को हर रोज मिटा जाता  हूँ
न  खुद के लिए न देश के लिए जीता हूँ

 हर रोज ..हर पल मरा करता हूँ
फिर भी गरूर है की जिया करता हूँ

ख़याल कुछ आते नहीं मटमैली तस्वीर हूँ
एक शहरी हूँ ..  धुंआ हर पल पिया  करता हूँ

स्याह हूँ ....स्वाह हो रहा हूँ मैं
शफ्फाक  ख्यालों से दूर हो रहा हूँ मैं

पलट कर देखने से भी डरता हूँ और
दिखाता हूँ के  साथ सब लिए चल रहा हूँ मैं