Friday, July 12, 2013

ऐ जिन्दगी तेरे अहसान उतारने है मुझे
वक्त रहते कुछ कर्ज उतारने हैं मुझे

वो आंसू जो तूने   दिए थे कभी
बन के मोती  पन्नो पर दमकते हैं अब भी

वो श हतूत के पेड़ से गिरना और
आधी बेहोशी में घर तक जाना
जीवन  के मुश्किल पलों   में लडखडा कर चलना सिखा गया  था

वो रूमानी  अहसास जो किसी कोमल पल में
तूने यूँ ही मेरी झोली में डाल दिए थे
वो आज भी महकते हैं उसी तरह

मेरे बेटे  का वो नन्हा स्पर्श जो
मैंने पहली बार अपने गर्भ में अनुभव किया था
वो आज भी ज्यूँ का त्यूं मेरी आत्मा में ज़िंदा है

वो  सेंकडों लम्हे जब दोस्तों के साथ
घंटों और दिनों तक एक ही बात पर हंसा करती थी मैं
आज भी मुझे गुदगुदा कर जाते हैं कभी कभी

वो मुश्किल पल जिन्होंने पल पल रुलाया
न जाने कब मन की गहराइयों तक पेठ कर
कतरा कतरा मेरे कोमल मन को सींचते रहे
की   आज कठिन से कठिन पल भी आसान लगने लगा   है


डगमगाना ,गिरना ,सम्हलना,फिर चलना और मुस्कराना
कितना कुछ तूने यूँ ही सिखाया है मुझे  

ऐ जिन्दगी तेरे अहसान उतारने है मुझे
वक्त रहते कुछ कर्ज उतारने हैं मुझे

     

Friday, January 11, 2013



खामोशी को मिलती हो  जहां  जुबान 
मुझे वो जहाँ  दे दो 

बहुत वक्त   से पहने हैं   होंठों ने पेबंद 
  इन्हें एक नया पेरहन दे दो 

हसरते कितनी खामोश सिसकती हैं यहाँ 
मिले जाए   पनाह वो जहाँ दे दो 

या मेरे हिस्से के आसमान को 
कैद से रिहा दे  दो 

Tuesday, December 18, 2012

सड़क के उस पार अन्धेरा है और  इ धर रोशनी चकाचक 
रोशनी में रहने वाले अन्धेरे से दूर हैं बहुत दूर 
 दोनों तरफ के लोग भी 
अलग हैं 
पर  एक बात दोनों में  एक सी है 
रोशनी में रहने वाले सोचते हैं 
थोड़ा अन्धेरा हो जाए 
और अँधेरे में    रहने वाले 
बड़ी शिद्दत से थोड़ी रोशनी चाहते हैं 

 
  

Saturday, October 27, 2012

(नज्म )


मुजमिन्द रहा फिर भी ......


जल गया ख्वाबे जहाँ


रात कुटना हो गयी


बेच कर सारे जज्बात


हर उम्मीद सो गयी




उठ रहा था उस तरफ़


सुर्ख लाल सा धुआं


हो रहा था हर तरफ़


ख्वाबे -कत्ले -आमद वहाँ




थी  हवा बेहद गरम


शयातीन सारी फिजा


जैसे साजिश कर रहा


जर्रा -जर्रा बारहा




स्याह परदों ने छुपाई


उममीद की हर किरण


लिए करवट बैठे रहे


सितारे तमाम बेरहम




कुल्ब हो चला था


ाहे मेरा जहाँ .............

ुजमिंद रहा था फिर भी

खुदा तुझ पे मेरा यकीं ....!!!!!

sujata











Sunday, October 14, 2012

ख़याल जब बचपन में हुआ करता था

दूध सा शफ्फाक   हुआ करता था
ख़याल जब बचपन में हुआ करता था

झांसी की रानी और राणा प्रताप का घोड़ा
कल्पना में  अक्सर रूबरू हुआ करता था

खून  भी रगों का बहुत उबाल  खाता था
ख्वाब में  भी गर दुश्मन आँख उठाता था

आज जब वक्त है और जवानी  भी
खून भी है  गरम है  रगों में रवानी भी

 झांसी की  रानी  को भूल कर
चेतक की  स्वामी भक्ति रख ताक पर

मैं मशगूल हूँ   हर दिन के काम
  और  ऐशो -आराम में 

भूल कर खुद को हर रोज मिटा जाता  हूँ
न  खुद के लिए न देश के लिए जीता हूँ

 हर रोज ..हर पल मरा करता हूँ
फिर भी गरूर है की जिया करता हूँ

ख़याल कुछ आते नहीं मटमैली तस्वीर हूँ
एक शहरी हूँ ..  धुंआ हर पल पिया  करता हूँ

स्याह हूँ ....स्वाह हो रहा हूँ मैं
शफ्फाक  ख्यालों से दूर हो रहा हूँ मैं

पलट कर देखने से भी डरता हूँ और
दिखाता हूँ के  साथ सब लिए चल रहा हूँ मैं  

एक सन्देश अल्पना के नाम ..अगर वो पढ़ सके तो

 जिन्दगी का बोझ इतना भारी  कभी हो ही नहीं सकता की उसे उठा कर चला  न जा सके  ..........ऐसा ही कुछ कहती थी वो कभी  .....जहां तक उसका सवाल था .....एक  बार जिन्दगी ने उससे हार मान ली हो होगी मगर वो आखिरी सांस तक सर उठा कर ही जी थी .......  .....अंब यह बात और है की सिर्फ सताईस साल  में  ही इश्वर ने उसे    अपने   पास बुला लिया था ......शायद इश्वर का होंसला भी
तब कमजोर रहा होगा  और  उसे भी किसी उत्साह वर्धक आख्यान की जरुरत महसूस हुई होगी तो बुला भेजा उसे .
इतने  हैरान क्यूँ   हैं  ....क्या  इश्वर का होंसला कभी कमजोर नहीं हो सकता ?....हो सकता है भई .... हर दिन  लाखों करोड़ों लोगों की समस्याएं सुनते  हैं वो ....आखिर को तो थकते ही होंगे न ....

सृष्टी के  कर्ता  और नियामक कब  ...क्यूँ ....और कैसा करेंगे ....यह तो वह ही जाने ..मुझे तो सिर्फ इतना पता है की उसके जाने के बाद जिन्दगी ही नहीं वक्त भी थम गया है ...हो रहा है सब  कुछ समय और जरुरत के अनुसार ..पर उसमें मैं कहीं भी नहीं हूँ ...और शायद होना भी नहीं चाहती ... एक अंतराल सा आया गया है .....जिन्दगी और मेरे बीच .......जिसे पाटना अब मेरे बस में नहीं है ...

लोग कहते हैं किसी के जाने से जिन्दगी कभी रुकती नहीं ......पर मैं इसे  सिरे से नकारती हूँ .....उसके जाने की बाद .....बहुत कुछ हुआ ..पर मैं अब भी वहीं हूँ ..जहां  उसने छोड़ा था ...और आज भी अगर वह है यहीं कहीं .....तो मेरा अनुरोध है की ..एक बार इसे   पढ़ ले ..और अगर हो सके तो मुझे बताये की मेरी गिनती किन लोगों मैं होती है वह जिनमें प्राण हैं या वह जिनमें प्राण तो हैं पर आत्मा बैरागी हो चुकी है

Thursday, October 11, 2012

सही- सही शक्ल

हम में शायद ही कोई ऐसा हो जिसने सही- सही शक्ल  जिन्दगी की देखी हो  ...हम से कोई भी यह नहीं जानताकी जिन्दगी की किताब मे  लिखा क्या है ..बस जो भी सामने आता है उसे ही हम जी और भोग लेते हैं .

बहुत छोटी  छोटी  बाते होती हैं जिनसे अगर चाहो तो जिन्दगी को वह रूप दे दो जैसा हम हमेशा से चाहते हैं ...शुक्रिया ..माफ़ कीजिएगा ....दो बहुत छोटे शब्द हैं जिनका समय और स्थिति अनुसार प्रयोग किया जाए तो बहुत सी अवांछित स्थितियों से बचा जा सकता है .....किसी अपने को देख कर मासूम  सी मुस्कराहट दे कर न सिर्फ आपको अच्छा लगेगा सामने वाला भी उस एक  क्षण के लिए अपनी परिस्थ्तिती भूल करआपकी  मुस्कराहट का जवाब मुस्कराहट से ही देगा ....घर -बाहर  की छोटी -2 बातों में अनावश्यक जल्दी से बच कर
अगर शान्ति और गंभीरता से कामों को किया जाये तो वेह सिरे से सही और संतुष्टिदायक होते हैंऔर फिर   जब दिन अच्छा बीतता है तो रात को तकिये   पर सर रखते ही नींद आपको आगोश में  ले लेती है  .....


 सब ठीक हैं ..आप खुश हैं ....आपके आस पास के लोग खुश हैं .......तो जिन्दगी का इससे हसीन  रूप कोई और हो सकता है क्या  ..?