कहेगा आसमान ही कभी शायद
परतों में दबी जो व्यथायें हैं
है ये कैसा दर्द जो आ आ कर फिर जा रहा है
मुझको तडपा रहा है या खुद को आजमा रहा है
Monday, May 30, 2011
एक ख़याल ही था शायद जो आ कर लौट गया चुप चाप
अगर तुम होते तो यकीनन खिलखिलाती सब दिशाएँ
चलो न आओ न सही
न बुलाओ न सही
बन जाओ ख़याल ही अगर तो
दिल बहल जाएगा
सफा ऐ जिन्दगी में एक ख्वाब तो मुस्कराएगा
Saturday, May 28, 2011
बहुत दिन नहीं हुए अभी इस बात को याद तो तब धुंदली होती है न जब हम उसे उपेक्षित छोड दे कभी दोहराये नहीं लेकिन उन यादों का क्या करें जिन्हें हम हर समय साथ लिए फिरते है वो उतरती नहीं और हम उनसे छूटते नहीं खैर वो जो भी हो मुद्दा यह है की कितना ठीक है यादों को ढोना जब जानते हैं की याद सिर्फ याद है और वो कभी आज नहीं हो सकती ....मिथ्या है .... तो क्यों बेवजह तर्क देते हैं ....कभी खुद को सही ठेरातेय हैं और कभी नियति को गलत ....
गुजर जाए वो लम्हा तो ही अच्छा है
बिता वकत चाहे जितना अच्छा है
साथ तो आज ही चला है न हमेशा
फिर चाहे वो झूठा है या सच्चा है