Thursday, January 29, 2009

माँ मुझसे अक्सर रूठ जाती है
मेरी आदतों से बहुत वो घबराती है

पर अपनी हर दुआ में वो मेरा ही सुख मनाती है
सुजाता दुआ
वो अक्सर आवाज देता है मुझे पीछे से
मुड कर देखूं तो नजर नहीं आता

मेरा साया है वो हर दम मेरे पीछे छुप जाता है
सुजाता दुआ
कल रात वो लम्हा बहुत देर तक नहीं बीता
तुम्हारी महक उस लम्हें में समाई थी

यह और बात है कि हर तरफ तन्हाई थी
सुजाता दुआ

Tuesday, December 30, 2008

गति और ठहराव


गति और ठहराव

ठहेरे हुए पानी में
जीवन तलाशते
जब मन उ च ट नें लगे
तो ........................
रंग बिरंगी तितलियाँ भी
नहीं भरमाती मन को

लंबा ठहराव......
स्थूलता ले आता है शायद

लगातार उड़ते पंछी
जब थकते हैं ......
तो ..........
खुला नीला आसमान
भी उन्हें नहीं लुभाता

लगातार क्रियाशीलता से
मन निष्क्रिय हो जाता है शायद

गति और ठहराव .......
दो अनिवार्य पहिये हैं
सफल जीवन के .....
किसी एक भी अनुपस्थिति में
जीवन घिसैटनें लगता है !!!!!!
सुजाता दुआ



इंदर धनुष ..


हम सभी के पास होता है
...एक इंदर धनुष ...
जिसकी रंगबिरंगी तारें
जुडी रहती हैं हमारे ...
...मन-मस्तिषक से .....

जब तक इन तारों पर
सुर बजते हैं .......
संतुलन बना रहता है
दिल और दीमाग का

बिन स्पंदन .......
इन्देर्धनुशी तारें ...
भूलने लगती हैं .....
जीवन -राग ...
और तभी जनम लेता है
असह्य विराग ....
सादर ,
सुजाता दुआ
Posted by sangharshhijiwan at 8:49 PM

Sunday, December 28, 2008

थोड़ा सा जी लो ..


मुझे हमेशा लगता है ..
तुम सिर्फ़ वो नहीं हो ...
जैसे दीखते हो .......

अच्छा तुम ही बताओ
क्या दिखने भर से हम
वैसे ही हो जाते हैं ..??
जैसे लगते हैं ......

कितनी ही आकान्शाओं को
हम दबाते हैं अक्सर ...
क्योंकि उनका होना
तथाकथित रूप से
ठीक नहीं होता ...!

पर कभी सोचा है !
क्या दबा देने से
मर जाती हैं .??
..आकान्शायें ....


या की फिर सिर्फ़
धूमिल हो जाती हैं .....


हवा का एक तेज झोंका
और फिर साफ़ नजर
आनें लगती है तस्वीर
अबकी बार ......
और भी दमकते रूप में....

की फिर उसकी चमक से
चौंधिया जाती हैं आँखें ....


तो बेहतर क्या है .....
थोड़ा सा जी लो ..
अपनी लिए भी
की फिर शायद
थोडा सा दर्द कम हो जाए
जो टीसता है अक्सर ....
सुजाता दुआ

Wednesday, December 24, 2008


Wednesday, December 24, 2008

पारदर्शिता

लोग अक्सर बनाते हैं ...
शब्दों के खूबसूरत घर
फिर उसे सजाते हैं ...
उपमाओं से ......
और खुश हो जाते हैं ...
अपनी वाक्कौशल पर


पता नहीं .....
नादान होते हैं या अनजान
जो इतना भी नहीं जानते
बिना भाव के शब्द
खोखले होते हैं ....
इतने पारदर्शी की
उनमें देखा जा सकता है
आर -पार की फिर
उन्हें (लोगों को ).....
आजमाने की
जरूरत भी नहीं रहती

सादर ,
सुजाता दुआ