Friday, January 11, 2013
Tuesday, December 18, 2012
Saturday, October 27, 2012
(नज्म )
मुजमिन्द रहा फिर भी ......
जल गया ख्वाबे जहाँ
रात कुटना हो गयी
बेच कर सारे जज्बात
हर उम्मीद सो गयी
उठ रहा था उस तरफ़
सुर्ख लाल सा धुआं
हो रहा था हर तरफ़
ख्वाबे -कत्ले -आमद वहाँ
थी हवा बेहद गरम
शयातीन सारी फिजा
जैसे साजिश कर रहा
जर्रा -जर्रा बारहा
स्याह परदों ने छुपाई
उममीद की हर किरण
लिए करवट बैठे रहे
सितारे तमाम बेरहम
कुल्ब हो चला था
चाहे मेरा जहाँ .............
मुजमिंद रहा था फिर भी
ऐ खुदा तुझ पे मेरा यकीं ....!!!!!
sujata
Sunday, October 14, 2012
ख़याल जब बचपन में हुआ करता था
दूध सा शफ्फाक हुआ करता था
ख़याल जब बचपन में हुआ करता था
झांसी की रानी और राणा प्रताप का घोड़ा
कल्पना में अक्सर रूबरू हुआ करता था
खून भी रगों का बहुत उबाल खाता था
ख्वाब में भी गर दुश्मन आँख उठाता था
आज जब वक्त है और जवानी भी
खून भी है गरम है रगों में रवानी भी
झांसी की रानी को भूल कर
चेतक की स्वामी भक्ति रख ताक पर
मैं मशगूल हूँ हर दिन के काम
और ऐशो -आराम में
भूल कर खुद को हर रोज मिटा जाता हूँ
न खुद के लिए न देश के लिए जीता हूँ
हर रोज ..हर पल मरा करता हूँ
फिर भी गरूर है की जिया करता हूँ
ख़याल कुछ आते नहीं मटमैली तस्वीर हूँ
एक शहरी हूँ .. धुंआ हर पल पिया करता हूँ
स्याह हूँ ....स्वाह हो रहा हूँ मैं
शफ्फाक ख्यालों से दूर हो रहा हूँ मैं
पलट कर देखने से भी डरता हूँ और
दिखाता हूँ के साथ सब लिए चल रहा हूँ मैं
ख़याल जब बचपन में हुआ करता था
झांसी की रानी और राणा प्रताप का घोड़ा
कल्पना में अक्सर रूबरू हुआ करता था
खून भी रगों का बहुत उबाल खाता था
ख्वाब में भी गर दुश्मन आँख उठाता था
आज जब वक्त है और जवानी भी
खून भी है गरम है रगों में रवानी भी
झांसी की रानी को भूल कर
चेतक की स्वामी भक्ति रख ताक पर
मैं मशगूल हूँ हर दिन के काम
और ऐशो -आराम में
भूल कर खुद को हर रोज मिटा जाता हूँ
न खुद के लिए न देश के लिए जीता हूँ
हर रोज ..हर पल मरा करता हूँ
फिर भी गरूर है की जिया करता हूँ
ख़याल कुछ आते नहीं मटमैली तस्वीर हूँ
एक शहरी हूँ .. धुंआ हर पल पिया करता हूँ
स्याह हूँ ....स्वाह हो रहा हूँ मैं
शफ्फाक ख्यालों से दूर हो रहा हूँ मैं
पलट कर देखने से भी डरता हूँ और
दिखाता हूँ के साथ सब लिए चल रहा हूँ मैं
एक सन्देश अल्पना के नाम ..अगर वो पढ़ सके तो
जिन्दगी का बोझ इतना भारी कभी हो ही नहीं सकता की उसे उठा कर चला न जा सके ..........ऐसा ही कुछ कहती थी वो कभी .....जहां तक उसका सवाल था .....एक बार जिन्दगी ने उससे हार मान ली हो होगी मगर वो आखिरी सांस तक सर उठा कर ही जी थी ....... .....अंब यह बात और है की सिर्फ सताईस साल में ही इश्वर ने उसे अपने पास बुला लिया था ......शायद इश्वर का होंसला भी
तब कमजोर रहा होगा और उसे भी किसी उत्साह वर्धक आख्यान की जरुरत महसूस हुई होगी तो बुला भेजा उसे .
इतने हैरान क्यूँ हैं ....क्या इश्वर का होंसला कभी कमजोर नहीं हो सकता ?....हो सकता है भई .... हर दिन लाखों करोड़ों लोगों की समस्याएं सुनते हैं वो ....आखिर को तो थकते ही होंगे न ....
सृष्टी के कर्ता और नियामक कब ...क्यूँ ....और कैसा करेंगे ....यह तो वह ही जाने ..मुझे तो सिर्फ इतना पता है की उसके जाने के बाद जिन्दगी ही नहीं वक्त भी थम गया है ...हो रहा है सब कुछ समय और जरुरत के अनुसार ..पर उसमें मैं कहीं भी नहीं हूँ ...और शायद होना भी नहीं चाहती ... एक अंतराल सा आया गया है .....जिन्दगी और मेरे बीच .......जिसे पाटना अब मेरे बस में नहीं है ...
लोग कहते हैं किसी के जाने से जिन्दगी कभी रुकती नहीं ......पर मैं इसे सिरे से नकारती हूँ .....उसके जाने की बाद .....बहुत कुछ हुआ ..पर मैं अब भी वहीं हूँ ..जहां उसने छोड़ा था ...और आज भी अगर वह है यहीं कहीं .....तो मेरा अनुरोध है की ..एक बार इसे पढ़ ले ..और अगर हो सके तो मुझे बताये की मेरी गिनती किन लोगों मैं होती है वह जिनमें प्राण हैं या वह जिनमें प्राण तो हैं पर आत्मा बैरागी हो चुकी है
तब कमजोर रहा होगा और उसे भी किसी उत्साह वर्धक आख्यान की जरुरत महसूस हुई होगी तो बुला भेजा उसे .
इतने हैरान क्यूँ हैं ....क्या इश्वर का होंसला कभी कमजोर नहीं हो सकता ?....हो सकता है भई .... हर दिन लाखों करोड़ों लोगों की समस्याएं सुनते हैं वो ....आखिर को तो थकते ही होंगे न ....
सृष्टी के कर्ता और नियामक कब ...क्यूँ ....और कैसा करेंगे ....यह तो वह ही जाने ..मुझे तो सिर्फ इतना पता है की उसके जाने के बाद जिन्दगी ही नहीं वक्त भी थम गया है ...हो रहा है सब कुछ समय और जरुरत के अनुसार ..पर उसमें मैं कहीं भी नहीं हूँ ...और शायद होना भी नहीं चाहती ... एक अंतराल सा आया गया है .....जिन्दगी और मेरे बीच .......जिसे पाटना अब मेरे बस में नहीं है ...
लोग कहते हैं किसी के जाने से जिन्दगी कभी रुकती नहीं ......पर मैं इसे सिरे से नकारती हूँ .....उसके जाने की बाद .....बहुत कुछ हुआ ..पर मैं अब भी वहीं हूँ ..जहां उसने छोड़ा था ...और आज भी अगर वह है यहीं कहीं .....तो मेरा अनुरोध है की ..एक बार इसे पढ़ ले ..और अगर हो सके तो मुझे बताये की मेरी गिनती किन लोगों मैं होती है वह जिनमें प्राण हैं या वह जिनमें प्राण तो हैं पर आत्मा बैरागी हो चुकी है
Thursday, October 11, 2012
सही- सही शक्ल
हम में शायद ही कोई ऐसा हो जिसने सही- सही शक्ल जिन्दगी की देखी हो ...हम से कोई भी यह नहीं जानताकी जिन्दगी की किताब मे लिखा क्या है ..बस जो भी सामने आता है उसे ही हम जी और भोग लेते हैं .
बहुत छोटी छोटी बाते होती हैं जिनसे अगर चाहो तो जिन्दगी को वह रूप दे दो जैसा हम हमेशा से चाहते हैं ...शुक्रिया ..माफ़ कीजिएगा ....दो बहुत छोटे शब्द हैं जिनका समय और स्थिति अनुसार प्रयोग किया जाए तो बहुत सी अवांछित स्थितियों से बचा जा सकता है .....किसी अपने को देख कर मासूम सी मुस्कराहट दे कर न सिर्फ आपको अच्छा लगेगा सामने वाला भी उस एक क्षण के लिए अपनी परिस्थ्तिती भूल करआपकी मुस्कराहट का जवाब मुस्कराहट से ही देगा ....घर -बाहर की छोटी -2 बातों में अनावश्यक जल्दी से बच कर
अगर शान्ति और गंभीरता से कामों को किया जाये तो वेह सिरे से सही और संतुष्टिदायक होते हैंऔर फिर जब दिन अच्छा बीतता है तो रात को तकिये पर सर रखते ही नींद आपको आगोश में ले लेती है .....
सब ठीक हैं ..आप खुश हैं ....आपके आस पास के लोग खुश हैं .......तो जिन्दगी का इससे हसीन रूप कोई और हो सकता है क्या ..?
बहुत छोटी छोटी बाते होती हैं जिनसे अगर चाहो तो जिन्दगी को वह रूप दे दो जैसा हम हमेशा से चाहते हैं ...शुक्रिया ..माफ़ कीजिएगा ....दो बहुत छोटे शब्द हैं जिनका समय और स्थिति अनुसार प्रयोग किया जाए तो बहुत सी अवांछित स्थितियों से बचा जा सकता है .....किसी अपने को देख कर मासूम सी मुस्कराहट दे कर न सिर्फ आपको अच्छा लगेगा सामने वाला भी उस एक क्षण के लिए अपनी परिस्थ्तिती भूल करआपकी मुस्कराहट का जवाब मुस्कराहट से ही देगा ....घर -बाहर की छोटी -2 बातों में अनावश्यक जल्दी से बच कर
अगर शान्ति और गंभीरता से कामों को किया जाये तो वेह सिरे से सही और संतुष्टिदायक होते हैंऔर फिर जब दिन अच्छा बीतता है तो रात को तकिये पर सर रखते ही नींद आपको आगोश में ले लेती है .....
सब ठीक हैं ..आप खुश हैं ....आपके आस पास के लोग खुश हैं .......तो जिन्दगी का इससे हसीन रूप कोई और हो सकता है क्या ..?
Wednesday, October 10, 2012
निःशब्द
बहुत बार कोशिश करने पर भी सही लफ्ज कागज़ पर नहीं उतरते ...कितना भी लिख लो कहानी की आत्मा कुलबुलाती ही रहती है कभी तृप्त नहीं होती ....आत्माओं का कोई ठोर ठिकाना नहीं होता ..बेहद मनमौजी होती है ....आज बहुत खुश हैं तो कल बहुत उदास ....कल तक जो कहानी रोमांच से भरपूर प्रफुल्लित थी वो अंत तक आते उदास होने लगती है और फिर अंत पर आकर ज़िद्दी बच्चे की तरह अड़ियल हो जाती है ...कितनी भी कोशिश कर लो ..समझा लो पुचकार लो मगर मजाल है की वो मान जाए ..उसे नहीं बढना है तो वो नहीं बढ़ेगी ..ऐसी ही अनेको अधूरी कहानियाँ यूँ ही अलमारी में यहाँ वहां बिखरी दबी रहती हैं उस दिन यूँ ही साफ़ सफाई करते समय कुछ पन्नों का एक पुलिंदा यकायक सामने आ गिरा ...
मैं यूँ ही पढने लगी मेरे ही लिखे लफ्ज मुझे रोमांचित कर रहे थे ....जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ने लगी ..मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी ...पता नहीं कितना वक्त हो चुका था इस कहानी को लिखे कोई भी ...दृश्य स्पष्ट याद नहीं था ...इसलिए उसे पढने में आनंद भी आ रहा था की यकायक एक घटना को पढते -2
मन विचलित होने लगा.........
'राजीव ने सोच लिया था अभी नहीं तो कभी नहीं ......ये टुकड़ों में बंट कर मुझ से नहीं जिया जाएगा आज तो कह ही दूंगा पापा से नहीं करना है मुझे ऍम बी ए नहीं बनना है मुझे sales executive ..वो कोई मेरे सगे पापा तो हैं नहीं जो मेरे मनाने से मान जायेंगे और मुझे वो करने देंगे जो मै करना चाहता हूँ ....जयादा से जयादा क्या हो जाएगा मुझे घर से चले जाने को ही कहेंगे न तो चला जाउंगा ...रह लूंगा कहीं भी यहाँ वहाँ और audition देता रहूंगा किसी दिन कभी तो मुझे फिल्म में काम मिलेगा ..और नहीं मिला तो बेनाम ही मर जाउंगा ...पर यूँ घुट घुट कर उधार की जिन्दगी नहीं जियूँगा मैं .....नहीं कभी नहीं ..पूरे संकल्प से वह घर में कदम रखता है ....तभी श्रुती दौड़ कर आ कर उससे लिपट जाती है उसे कुछ स मझ नहीं आ रहा ...'.. घर में इतनी खामोशी क्यूँ है सब कहाँ गए श्रुती ...'
श्रुती रोने लगती है ..ह्रदय विदारक रुदन ..वह दौड़ कर घर के अन्दर जाता है सफ़ेद चादर में लिपटा एक शव धरती पर पडा है ....वह मुंह उघाड़ देता है ..... कांपते कदमों से वहीँ बैठ जाता है .....
उसके पापा का शव धरती पर पड़ा है ...कुछ क्षण पहले का उसका आंतरिक विद्रोह भी उनके शव के साथ ही निढाल पड़ा था ...बस कुछ ही साँसे शेष थीं .....'
कुछ ही साँसे शेष थीं मतलब ...फिर क्या हुआ ......
यहीं पर आ कर कहानी रुक गयी .......और एक बार फिर मैं खुद को पराजित होते हुए देख रही थी ..निःशब्द
मैं यूँ ही पढने लगी मेरे ही लिखे लफ्ज मुझे रोमांचित कर रहे थे ....जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ने लगी ..मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी ...पता नहीं कितना वक्त हो चुका था इस कहानी को लिखे कोई भी ...दृश्य स्पष्ट याद नहीं था ...इसलिए उसे पढने में आनंद भी आ रहा था की यकायक एक घटना को पढते -2
मन विचलित होने लगा.........
'राजीव ने सोच लिया था अभी नहीं तो कभी नहीं ......ये टुकड़ों में बंट कर मुझ से नहीं जिया जाएगा आज तो कह ही दूंगा पापा से नहीं करना है मुझे ऍम बी ए नहीं बनना है मुझे sales executive ..वो कोई मेरे सगे पापा तो हैं नहीं जो मेरे मनाने से मान जायेंगे और मुझे वो करने देंगे जो मै करना चाहता हूँ ....जयादा से जयादा क्या हो जाएगा मुझे घर से चले जाने को ही कहेंगे न तो चला जाउंगा ...रह लूंगा कहीं भी यहाँ वहाँ और audition देता रहूंगा किसी दिन कभी तो मुझे फिल्म में काम मिलेगा ..और नहीं मिला तो बेनाम ही मर जाउंगा ...पर यूँ घुट घुट कर उधार की जिन्दगी नहीं जियूँगा मैं .....नहीं कभी नहीं ..पूरे संकल्प से वह घर में कदम रखता है ....तभी श्रुती दौड़ कर आ कर उससे लिपट जाती है उसे कुछ स मझ नहीं आ रहा ...'.. घर में इतनी खामोशी क्यूँ है सब कहाँ गए श्रुती ...'
श्रुती रोने लगती है ..ह्रदय विदारक रुदन ..वह दौड़ कर घर के अन्दर जाता है सफ़ेद चादर में लिपटा एक शव धरती पर पडा है ....वह मुंह उघाड़ देता है ..... कांपते कदमों से वहीँ बैठ जाता है .....
उसके पापा का शव धरती पर पड़ा है ...कुछ क्षण पहले का उसका आंतरिक विद्रोह भी उनके शव के साथ ही निढाल पड़ा था ...बस कुछ ही साँसे शेष थीं .....'
कुछ ही साँसे शेष थीं मतलब ...फिर क्या हुआ ......
यहीं पर आ कर कहानी रुक गयी .......और एक बार फिर मैं खुद को पराजित होते हुए देख रही थी ..निःशब्द
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