क्या दिखा था तुम्हें पत्थरों से उलझ कर हुआ हृदय छलनी सरिता का जल पूरित आँचल में ही घुल गया कहीं अश्रुजल उसका
टूट कर बिखरी धारा असंख्य जल कणों में खो गयी और तुमनें था कहा प्रकृति विभूषित हो गयी
क्या कभी हृदय में रंच मात्र न संदेह जगा क्यूँ शुष्क नदी मार्ग शैल कण से है सजा कहीं ताप सहते हुए शीतला शिला तो न हो गयी स्याह वक्त से हार हो थक कर सो रही
वो कल आयी थी वही सवाल था उसकी आँखों में मेरे पास जिसका जवाब नहीं था मैं उस से नजरें चुरानें लगा पुरुष हो कर भी कमजोर हूँ बुजदिली से उसे बतानें लगा वह सुनती रही , मैं कहता रहा ... वह लौट गयी...... मुझे भी गुमां होने लगा अपनीं चतुराई का और फिर सोचनें लगा कल क्या कहूंगा जवाब पहले से तय हो तो जुबां लडखडाती नहीं हैं
आज... दिन ढले तक भी वह नहीं आयी ... कई बार मैं दरवाजे तक जा कर हो आया मन में बैचेनी उफननें लगी बाहों में पुरुषत्व मचलनें लगा... अँधेरे के फैलते साए में मुझे साफ़ नजर आनें लगा ..... अपना खोखला अस्तित्व सुजाता दुआ