Thursday, May 26, 2011

अब  भी  जेहन में  महकता है ईमान मेरा
बेकदर हो कर भी दमकता है ईमान मेरा
बात करते हें अपनों सी फिर भी 'नकाब ' रखते हैं
अब जमाने में लोग कहाँ 'अदब ओ लिहाज' रखते हैं

Sunday, March 27, 2011

बेरुखी से गैरों की न टूटेगा दिल ...

 बेरुखी  से गैरों  की   न  टूटेगा  दिल ...
दोस्तों  को  एक  बार  आजमा  लीजिये

लगेगा   रूमानी  फिर  हर  मौसम
दोस्ती ज़रा  खुद  से  निभा  लीजिये....

कभी  अपनें ही मन से बतियाया  करें
नजरें  खुद  से भी जरा  मिलाया  करें


 है कितना  इशक  खुद से   पता  हो  जाएगा
निभाना  ज़माने  से  आसान  हो  जाएगा

Wednesday, March 17, 2010

It Pains

My heart pains
Whenever a bit of past
Roam around my eyes
Oh!!!!! Its terrible
to remind a single bit

I try to wash
want to wipe everything..
But fails….

Nothing will work when
heart pour in to tears
...Its undefinable…

Oh!! God
I want to stand
I want to smile
I want to shine!!!!

Again I collect
Broken pieces of
Smashed heart
Again I Play scrruble
And arrange them

May be some day
Sooner or later
I can be able to stand
Firmly beside my past

Yes ! I do
I will Do!!!

Sujata

Saturday, July 18, 2009

क्यूँ शिला वो हो गयी

क्या दिखा था तुम्हें
पत्थरों से उलझ कर
हुआ हृदय छलनी सरिता का
जल पूरित आँचल में ही
घुल गया कहीं अश्रुजल उसका

टूट कर बिखरी धारा
असंख्य जल कणों में खो गयी
और तुमनें था कहा
प्रकृति विभूषित हो गयी

क्या कभी हृदय में
रंच मात्र न संदेह जगा
क्यूँ शुष्क नदी मार्ग
शैल कण से है सजा
कहीं ताप सहते हुए
शीतला शिला तो न हो गयी
स्याह वक्त से हार
हो थक कर सो रही

सुजाता दुआ

Saturday, May 16, 2009

खोखला अस्तित्व


वो कल आयी थी
वही सवाल था उसकी
आँखों में
मेरे पास जिसका जवाब नहीं था
मैं उस से नजरें चुरानें लगा
पुरुष हो कर भी कमजोर हूँ
बुजदिली से उसे बतानें लगा
वह सुनती रही ,
मैं कहता रहा ...
वह लौट गयी......
मुझे भी गुमां होने लगा
अपनीं चतुराई का
और फिर सोचनें लगा
कल क्या कहूंगा
जवाब पहले से तय हो
तो जुबां लडखडाती नहीं हैं

आज... दिन ढले तक भी
वह नहीं आयी ...
कई बार मैं दरवाजे तक
जा कर हो आया
मन में बैचेनी
उफननें लगी
बाहों में पुरुषत्व
मचलनें लगा...
अँधेरे के फैलते साए में
मुझे साफ़ नजर
आनें लगा .....
अपना खोखला अस्तित्व
सुजाता दुआ

Sunday, May 3, 2009

कितनी ही बार ऐसा होता है की ना चाहते हुए भी
हम वह सब करते हैं जो समय हम से करवाता है
तब क्या हम बुजदिल होते हैं झूठ को झूठ नहीं कह
पाते और हर ग़लत को मुस्करा कर सही कहते हैं
या कि फिर
इस सच के पीछे एक दर्दीला सच यह भी है कि
मुस्करा कर जहर पीना हमारी आदत हो चुकी होती है .....

कुछ इसी दर्द से आहत हो कर कहा था ......

नज्म
अब तो हर बात पुरानी लगती है
सफा एजिन्दगी से बद गुमानी लगती है
हर चेहरे के पीछे एक नया चेहरा
यह महफिल अब अनजानी लगती है
छोडनें से छूट जाती तो क्या बुरा था
ज़माने से यह प्रीत पुरानी लगती है
बेजारी से कहते हैं अब न निभाएंगे
महक ए जिन्दगी न अब रूमानी लगती है
पल पल गिनते हैं ,मुस्करा कर मिलते हैं
जहर हँस के पीने की आदत पुरानी लगती है
सुजाता