Tuesday, February 24, 2009


मेरा हर सवाल
दीवारों से टकरा कर
खाली हाथ लौट आता है
हर कश्ती को मांझी मिल जाए यह जरूरी तो नहीं

Saturday, February 21, 2009

मंजिलों के उजाले
मुझे नहीं लुभाते

मैने साहिल पर कश्तियों को डूबते देखा है

Wednesday, February 18, 2009

दर्द की थकी लकीरें उसके चेहरे पर
बार बार कसमसा कर लौट आती थीं

'पुरानें जख्मों' की चुभन उसे 'अब' भी तोड़ जाती है
वो बात करते हुए अक्सर
अनकही बातों के जाल में उलझ जाती है

उसे पता नहीं .. बिनकहे वेह बहुत कुछ कह जाती है
उस दिन जब तुमनें कहना चाहा था
दिल का कोई भेद मैने बात पलट दी थी

गहराइयों के अंधेरे बहुत भयानक होते हैं

Monday, February 16, 2009

समझा न उसनें मुझ से कहा न गया
जखम दिल का कभी दिखाया न गया

महफिले चरागाँ है वो हम जानते हैं लेकिन
दिल का अँधेरा उससे मिटाया न गया

कल तक जो मिलता था रोज मुस्करा के
फटे हाली में आज 'मैं' उससे पहचाना न गया

बेहद अम्ली है वो हर पल रंग बदलता है
गोया तभी हमसे वो कभी परखा न गया

ऐ काश की समझता वो हाल- ए - दिल
कितना वीरानां है वहाँ हमसे बताया न गया
सुजाता

Thursday, February 5, 2009

सिंदूरी शाम का रंग चहेरे पर उतर आया था
जब मेरा साया उन्हें हौले से छु आया था

कहा था फिर दमकते गालों ने कुछ धीमे से
सुन जिसे मेरा रोम- रोम सिहर आया था

कर के मासूम इशारा जानें कहाँ पे छिप गए
इन्तेजार में दिल मेरा हलक में उतर आया था

अब तो हर पल का बीतना मुश्किल हो गया
कब जिन्दगी हो जाती सजा पता हो आया था

न तो मिलते हैं न कोई झलक ही पाता हूँ
मायनें इश्क है क्या अब समझ आया था
सुजाता